Kach & Devyani Part S

ययाति ब्रह्मा के 10वीं पीढ़ी के थे। इनकी शादी देवयानी से हुई थी। देवयानी शुक्राचार्य की पुत्री थी. शुक्राचार्य  असुरो के गुरु  थे।देवताओ के  गुरु वृहस्पति  थे ।  शुक्राचार्य  और वृहस्पति दोनों ही ब्राह्मण थे।   गुरु वृहस्पति के पिता ऋषि अङ्गिरा थे इसीलिए वृहस्पति को आङ्गिरस कहा जाता है।  शुक्राचार्य  और वृहस्पति में पर्तिस्पर्धा  रहती थी कि दोनों में कौन श्रेष्ठ है। शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या थी जिससे वे मृत व्यक्ति को भी जीवित कर देते थे। शुक्राचार्य राजा  वृषपर्वा के राज्य में रहते थे। जब देवता असुरो को मार डालते तो  शुक्राचार्य उन्हें अपनी संजीवनी विद्या से फिर से जीवित कर  देते। लेकिन देवता अपने मृत योद्धाओं को फिर से जीवित न कर पाते। इससे देवता वृहस्पति के पुत्र कच के पास गए और उपाय की खोज करने लगे की किस तरह से  शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त की जाय। देवताओ की बात सुनकर कच तैयार हो गए और वे  शुक्राचार्य  के पास गए। कच ने  शुक्राचार्य  से कहा की मैं वृहस्पति का पुत्र कच हूँ और विनती करता हूँ की आप हमे अपना शिष्य बना ले ,में हजार वर्षो तक ब्रम्हचर्य धारण कर  आपके पास रहूँगा और शिष्य कर्तव्य का पालन करूंगा।  शुक्राचार्य ने कच को शिष्य रूप में स्वीकार कर लिया। कच अपने गुरु की सेवा करता और गुरु पुत्री देवयानी की भी सेवा करता। देवयानी कच से बहुत प्रसन्न रहती ,इससे असुरो को बहुत बुरा लगा। असुर नहीं चाहते थे की कच गुरु के पास रहे अतः एक दिन असुरो ने कच को जंगल में गाय चराते समय मार डाला और कच के ट्कड़े टुकड़े करके  सियार कुत्तो को खाने के लिए जंगल फेंक आये. जब शाम हुई तो देवयानी ने देखा की कच नहीं आया है तब वह रोते हुए पिता के पास गयी ,शुक्राचार्य ने मन्त्र से भेड़िया कुत्तो के शरीर से कच  को बहार निकाल कर जीवित कर दिया। असुरो ने यह काम कई बार किया वे कच को मार देते किन्तु देवयानी पिता से कहकर बार बार कच जीवित करवा लेती। अंत में असुरो ने कच को मारकर फिर जलाकर उसकी राख बना ली और वारुणी अर्थात शराब में राख मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दी। जिससे कच  शुक्राचार्य  के पेट में राख के रूप में चला गया। बहुत समय तक जब कच दिखाई नहीं दिया तो देवयानी ने पिता से फिर कहा पिताजी कच दिख नहीं रहा है ,अबकी बार जब गुरुजी संजीवनी शक्ति का प्रयोग किया तो पेट के अंदर से आवाज़ आई की गुरु जी में आपके पेट में हूँ ,गुरूजी ने कहा की यदि तुम अब भी मेरे पेट में हो तो अवश्य ही तुम इंद्र नहीं कोई ब्राह्मण हो ,यदि मैं तुम्हे     बहार निकलता हूँ तो मेरी मृत्यु हो जाएगी अतः में तुम्हे संजीवनी विद्या देता हूँ बहार आकर तुम मुझे जीवित कर देना। लेकिन शुक्राचार्य से गलती हुई थी की उन्होंने शराब पी थी अतः श्राप दिया कि अब जो कोई भी ब्राह्मण शराब पियेगा तो उसका धर्मभ्रष्ट हो जायेगा उसके परलोक  का नाश हो जायेगा।
इस तरह से कच को संजीवनी विद्या की प्राप्ती हुई। जब कच वापस अपने घर को चलने लगा तो देवयानी ने कच से विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन कच ने कहा की मैंने शिष्य कर्तव्य का पालन किया है अतः मै आपसे विवाह नहीं कर सकता क्योकि आपके पिता मेरे गुरु है अतः आप मेरी बहन हुई  ,लेकिन देवयानी जिद करने लगी और हट कर बैठी तब    देवयानी ने कच को श्राप दियाकि  तुम्हारी संजीवनी विद्या तुम्हारे काम न आये ,कच ने कहा की तुमने अपने काम के वश होकर मेरी संजीवनी विद्या को निर्रथक किया है ,कोई बात नहीं में जिसे सिखा दूंगा संजीवनी विद्या उसके काम तो आएगी लेकिन कच ने श्राप दिया तुमने काम के वश में आकर मेरी विद्या को असफल किया है अतः अब देवयानी से कोई ब्राह्मण विवाह नहीं कर सकेगा। ऐसा कहकर कच स्वर्ग आ गया।
क्रमशः 

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